क्या मै उड़ सकती हूं…..

पिंजड़े में पंछी पड़ी

सोचती एक बात को खड़ी

क्या मै उड़ सकती हूं आसमानों में,

क्या छू सकती हूं बादलों को

ये पंख फड़फड़ाते है हमेशा

चाहते है उच़ा उड़ना

पर एक सवाल मेरे जख्मों को कुरेरती है ।

” क्या मै उड़ सकती हूं ”

सालो से यहा पड़ी हूं

इस बेजान से पिंजड़े पर

जो बात भी नहीं करती किसी विषय पर।

बस मेरा ची – ची करनl

लोगों को भाता है

पर मेरे बेजान पंख़,

उन्हें कहा नजर आता है ।

अब यही जिंदगी है मेरी ,

पंख बेजान पड़े है

पर जिंदा हूं अभी

दाना और पानी भी है ।

देखती हूं उन पंचियो को

जो आसमानों में उड़ते है,

दाना के लिए भटकते है

पानी के लिए तड़पते है

पर उन्हें भरोसा है उनके पंखों पर

ये वरदान है उनके लिए

और इस पिंजरे में रहना

अभिशाप है इन पंखों के लिए…….

लिखने की चाह में

The Invincible

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भटकने की चाह थी ……

भटकने की चाह थी मगर

मंज़िल तक पहुंच ही गया।

सोचा ना था कभी, पहुंचूंगा यहां

पर रास्ता यहां छोड़ गया।

सच तो यह है कि,

चलना भी गंवारा ना था मुझे,

फरेबी चाह ने जो हुस्न दिखाया,

तो मैं अपनी चाह छोड़ गया।

मै चल पड़ा राह पे,

जिसकी चाह थी मुझे,

मंज़िल कहीं और थी मेरी,

और मैं अपनी राह ही मोड़ गया।

चला तो था राह पर,

जहां से मंजिल साफ थी मेरी,

राह का मुसाफिर हूं

मै अपनी मंजिल छोड़ चला।

रास्ते बेजान पड़े थे,

मंज़िल कहीं और थी।

जाना ना था जिस राह में,

मै उस राह की ओर चला।

लिखने की चाह में………

The Invincible